‘रहबर जौनपुरी’ अलविदा कह गए फानी दुनिया को

‘रहबर’ ये ज़िंदगी थी बहुत मो’तबर मगर,
मेरा वजूद मुझ को तमाशा बना गया.

जौनपुर। हिंदुस्तान के मशहूर शायरों में शुमार ‘रहबर जौनपुरी’ ने 85 साल की उम्र में इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके इंतकाल से साहित्य की दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई। उनका पूरा जीवन उर्दू अदब को समर्पित रहा। रहबर जौनपुरी की करीब 11 किताबें उर्दू अदब में अपनी एक पहचान रखती हैं। राष्ट्रपति पुरस्कार समेत अनेक पुरस्कारों ने उनकी शेरो-शायरी का सम्मान किया है।
खेतासराय क्षेत्र के सीधा जैगहा गांव के मूल निवासी मिनहाज अंसारी का तखल्लुस रहबर जौनपुरी था। साहित्य की दुनिया में लोग इन्हें ‘रहबर जौनपुरी’ के नाम से ही जानते थे। इनका जन्म जैगहा गांव में सन् 1939 में एक किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता शेख अब्दुल हमीद मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखते थे तथा खेती किसानी करने के साथ-साथ ग्राम प्रधान के पद पर रहकर समाज सेवा भी करते थे। गांव की सोंधी मिट्टी में प्राथमिक शिक्षा मकतब से ग्रहण कर उच्च शिक्षा के लिए महानगरों की तरफ रुख किया। उर्दू से स्नातक रहे रहबर शुरू से ही शेरो-शायरी में काफी शौक था। आजीविका के लिए उन्हें मध्यप्रदेश के भोपाल में बिजली विभाग में नौकरी मिल गई। इसके साथ ही साथ शेरो-शायरी की दुनिया से लगाव भी बढ़ता गया जो इतना परवान चढ़ा कि वे राष्ट्रपति पुरस्कार से लेकर दो दर्जन से अधिक पुरस्कारों से नवाजे गए।

सन् 1953 में साहित्य की दुनिया में कदम रखने के बाद उन्होंने एक ऐसा छाप छोड़ी जो अमिट रही। सन् 1959 में भोपाल उर्दू एकेडमी बड़े अवार्ड के लिए चयनित हुए। इसके बाद सन् 1988 में रोटरी क्लब रायपुर के पहले उर्दू अवार्ड से सम्मानित हुए। इसके पश्चात उन्हें 1989 में बीएचएल ने अपने सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया। इसी तरह सन् 1996 में देश के सर्वोच्च सम्मान राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मनित होने के बाद उनका कद बढ़ गया।सम्मानित होने का सिलसिला यहीं नहीं रुका। सन् 1997 में ‘ऐदारा बाबुल इल्म देहली’ सम्मान भी इनके नाम रहा। इसी वर्ष एमपी फन व फनकार आवार्ड से भी नवाजे गए। सन 2002 में कहकशाँ ने अदब भोपाल आवार्ड से सम्मानित किया। इसके साथ ही साथ दो दर्जन से अधिक सम्मान से नवाजे जा चुके है। आपकी पसन्दीदा शायरी में से कुछ शायरी…कभी रिश्तों को रोते हैं कभी मुश्किलों को रोते हैं। जो नकामे सफर होते हैं वह मंजिल को रोते हैं। …बिखरा बिखरा हस्ती का शिराज़ा है। दीवारों पर खून अभी तक ताज़ा है.. । रहबर जौनपुरी की पैगामे हक, अश्क एक शहर, एतबार, रिक्शेकलम, आवाजें जंजीर, बोलते हर्फ़, मौज ए सराब सहित 11 किताबें काफी पढ़ी गई हैं। उनके इंतकाल से पूरा जैगहा गांव शोकाकुल है, शोक संवेदना प्रकट करने वालों का सिलसिला जारी है। समाजवादी पार्टी ने अपने शोक संदेश के तौर पर ट्वीट किया है कि “हिंदुस्तान के मशहूर-ओ-मारूफ़ शायर जनाब ‘रहबर जौनपुरी’ साहब का इंतक़ाल अपूरणीय क्षति”। रहबर जौनपुरी ने एक जगह लिखा है कि
‘रहबर’ ये ज़िंदगी थी बहुत मो’तबर मगर
मेरा वजूद मुझ को तमाशा बना गया.

जौनपुर की गंगा जमुनी संस्कृति रहबर जौनपुरी ने अपनी शायरी में बरकरार रखा। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम पर उनकी एक नज़्म है- राम

रहबर जौनपुरी

आईना-ए-ख़ुलूस-ओ-मोहब्बत यहाँ थे राम
अम्न और शांति की ज़मानत यहाँ थे राम

सच्चाइयों की एक अलामत यहाँ थे राम
या’नी दिल-ओ-निगाह की चाहत यहाँ थे राम

क़दमों से राम के ये ज़मीं सरफ़राज़ है
हिन्दोस्ताँ को उन की शुजाअ’त पे नाज़ है

उन के लिए गुनाह था ये ज़ुल्म-ओ-इंतिशार
ईसार उन का सारे जहाँ पर है आश्कार

दामन नहीं था उन का तअ’स्सुब से दाग़-दार
हिर्स-ओ-हवस से दूर थे वो साहब-ए-वक़ार

बे-शक उन्हीं के नाम से रौशन है नाम-ए-हिंद
इक़बाल ने भी उन को कहा है इमाम-ए-हिंद

लाल-ओ-गुहर की कोई नहीं थी तलब उन्हें
इज़्ज़त के साथ दिल में बसाते थे सब उन्हें

बचपन से ना-पसंद थे ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब उन्हें
लोगों का दिल दुखाना गवारा था कब उन्हें

वो ज़ालिमों पे क़हर ग़रीबों की ढाल थे
किरदार-ओ-ए’तिबार की रौशन मिसाल थे

उन को था अपनी रस्म-ए-उख़ुव्वत पे ए’तिमाद
ख़ुद खा के जूठे बेर दिया दर्स-ए-इत्तिहाद

फ़र्ज़-आश्ना थे फ़र्ज़ को रक्खा हमेशा याद
कहने पे अपनी माँ के कहा घर को ख़ैर-बाद

रुख़्सत हुए तो लब पे न थे शिकवा-ओ-फ़ुग़ाँ
ये हौसला नसीब हुआ है किसे यहाँ

बन-बास पर भी लब पे न था उन का एहतिजाज
भाई के हक़ में छोड़ दिया अपना तख़्त-ओ-ताज

करते रहे वो चौदह बरस तक दिलों पे राज
हिन्दोस्ताँ में है कोई उन की मिसाल आज

राह-ए-वफ़ा पे चल के दिखाया है राम ने
कहते हैं किस को त्याग बताया है राम ने

रहबर ये शर-पसंद कहाँ और कहाँ वो राम
वो बे-नियाज़-ए-ऐश-ओ-तरब ज़र के ये ग़ुलाम

वो पैकर-ए-वफ़ा ये रिया-कार-ओ-बद-कलाम
वो अम्न के नक़ीब ये शमशीर-ए-बे-नियाम

रस्म-ओ-रिवाज-ए-राम से आरी हैं शर-पसंद
रावन की नीतियों के पुजारी हैं शर-पसंद

स्रोत :
पुस्तक : Raqs-e-Qalam (पृष्ठ 58) रचनाकार : Rehbar Jaunpuri प्रकाशन : Mohammad Tariq and Aabshar Ahmad, Shahwar Ahmad (2008) संस्करण : 2008

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