इतिहास का हिस्सा बना इस बार का दशहरा, नहीं हो सका अन्यायी रावण का संहार

जौनपुर। शारदीय नवरात्रि के बाद आने वाला प्रमुख पर्व दशहरा इस बार इतिहास के पन्नों का हिस्सा बन गया। दशहरा के मौके पर जिले के शहरी और ग्रामीण अंचलों में जगह जगह परंपरागत ढंग से हर साल मेले का आयोजन होता रहा है। इसी मेले में असत्य पर सत्य और अन्याय पर न्याय के विजय का प्रतीक रावण का संहार होता रहा है। अन्याय और बुराइयों के प्रतीक स्वरूप रावण के पुतले का दहन इस बार नहीं हो सका। बुजुर्गों के अनुसार इसके पूर्व वर्ष 1971 में आयी बाढ़ के कारण मेला स्थल पर पानी भरा होने से राजा साहब के पोखरे पर रावण के पुतले का दहन नहीं हुआ, जिसे बाद में गोमती नदी में प्रवाहित कर दिया गया था। इस वर्ष‌ ग्रामीण अंचल में छिटपुट स्थानों को छोड़कर ना तो कहीं परंपरागत रामलीला का मंचन हो सका और ना तो कहीं दशहरा मेला का आयोजन हुआ। कोरोना महामारी के प्रसार से बचाव को ध्यान में रखकर प्रशासन द्वारा तय की गई कड़ी गाइडलाइंस के कारण पूरा उत्सव फर्ज अदायगी तक ही सीमित रहा। ऐसे माहौल में धार्मिक दृष्टि से दशहरा सोमवार को होने‌ और सरसरी तौर पर रविवार को मनाये जाने का भी चहल पहल पर असर रहा।


कुछ लोगों ने परंपरा का पालन करने और बच्चों की खुशी के लिए छोटा सा रावण बनाकर बच्चों के बीच दहन कर उन्हें खुश किया। शाहगंज में अपवाद स्वरूप एक छोटे दशहरा मेले के आयोजन और रावण के पुतले का दहन होने की सूचना मिली है। कोरोना के नाम पर इस बार जौनपुर शहर स्थित राजा जौनपुर के पोखरे पर आयोजित होने वाला ऐतिहासिक दशहरा मेला नहीं लगा। कुछ रेहड़ी और ठेले वालों ने वहां जाकर दुकानें जरूर लगाई लेकिन वहां तैनात पुलिसकर्मियों ने उन्हें लाठी दिखा कर खदेड़ दिया। मेले के अवसर पर अच्छी कमाई करने वाले कुछ फुटपाथी दुकानदारों ने निराश होकर शहर में एक-दो स्थानों पर अपनी दुकानें लगा कर थोड़ी चहल-पहल पैदा की। मेला देखने के लिए व्याकुल बच्चों को लेकर उनके माता-पिता ऐसे प्रतीक मेले में पहुंचे भी। वहां छोटे बच्चों ने गुब्बारे, खिलौने खरीदे। चाट-पकौड़ी का लुत्फ उठाया और रेवड़ी, पपड़ी खरीद कर घर लौट आए।

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